।। निशा-पवन ।। दूर क्षितिज,ढलते सूरज की ज्योति शिथिल, सांझ उतरी वसुधा पर ओढ़े तिमिर। दिन की लाली हुई लुप्त , निशा बावली है आगंतुक। खग-विहग दुूबके शाखों में , निशाचर निकले विश्रामों से। नगरो का शोर चला मंद मंद , बजने लगे पूजा के शंख घंट, सांझ बावली हो चली, वो मंद मंद निशा हो चली । तपती दोपहरी लू अब प्राणघाती न लगे, ये सांझ पवन अब निशा संग बहने लगे, ज्यों ज्यों निशा बिखेरने लगे पंख, प्राण-वायु, देती सीने को ठंड। वो दिन में जो जाने लील चुकी, लू थी तो किसकी जान बख्शी ? उषा की प्राणवायु , दिन की लू होकर पाये कलंक, ज्यों निशा हुई संग, पवन होने लगी निष्कंलंक । आसमां के चंद्र संग टिमटिमाते रहे तारे, इधर वसुधा पर निशा संग पवन गोते मारे, निशाचर है बेफिक्र,प्रकृति है बिल्कुल शांत, नगर-कस्बे-शहर मौन ,दिन में होते जो अशांत। आओ इस मौन में निशा के गीत सुने, गुनगुनाती पवन,के अधरो की प्रीत सुने। निशा संग विहार गीत गा रही पवन , आओ इनके मिलन गीत सुने । आज जब रिश्ते हो गये बंधन, क्या ...
Shukriya
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